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जनकवि रमाशंकर विद्रोही की प्रथम पुण्यतिथि पर मधुबन बीएचयू में आयोजित हुई श्रधांजलि सभा

वाराणसी ।। आज गुरुवार को मधुबन बीएचयू में , जनकवि रमाशंकर विद्रोही के प्रथम पुण्यतिथि पर श्रधांजलि सभा एवं काव्यपाठ का आयोजन जॉइंट एक्शन कमिटी बीएचयू की ओर से किया गया। छात्रों ने जनकवि को श्रद्धासुमन के वक्तव्यों से पुण्य स्मरण किया। वक्ताओं ने कवि के जीवन परिचय को देते हुए बतलाया की रमाशंकर यादव ‘विद्रोही’ (3 दिसम्बर 1957 – 8 दिसंबर 2015) हिंदी के लोकप्रिय जनकवि हैं।

प्रगतिशील परंपरा के इस कवि की रचनाओं का एकमात्र प्रकाशित संग्रह ‘नई खेती’ है। इसका प्रकाशन इनके जीवन के अंतिम दौर 2011 ई0 में हुआ। वे स्नातकोत्तर छात्र के रूप में जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय नई दिल्ली से जुड़े। यह जुड़ाव आजीवन बना रहा। इनका निधन 8 दिसंबर 2015 को 58 वर्ष की अवस्था में हो गया।

krडिग्री ,नौकरी और जीवन के भौतिक उलझाऊ पिजड़े को तोड़ने वाले शख्शियत विद्रोही जी छात्र आंदोलनों में सक्रीय होकर आजीवन जेएनयू में बिताए। अपनी लेखनी के बदौलत वे क्रांति संघर्ष के चल रहे युद्धोको उत्प्रेरित करते रहे। हाशिये के समाज के सवालो को शब्द रूप देना , उसे सामाजिक राजनैतिक विमर्श में ले आना अपने आप में एक कठिन काम है , और उसे काव्य रूप में साहित्यिक रूप में स्थापित करना एक अत्यंत दुरूह कार्य है जो की रमाशंकर जी ने अपने कलम से किया है।

आने वाला कल और क्रांति संघर्ष से पैदा हुई दुनिया सदैव उनकी ऋणी रहेगी। छात्रों ने जनकवि के कविता पाठ से कार्यक्रम का समापन किया। धार्मिक पाखण्डो पर वार करती हुई उनकी कविता ” मैं किसान हूँ, आसमान में धान बो रहा हूँ, कुछ लोग कह रहे हैं, कि पगले! आसमान में धान नहीं जमा करता, मैं कहता हूँ पगले! अगर ज़मीन पर भगवान जम सकता है, तो आसमान में धान भी जम सकता है। ” के पाठ के बाद राष्ट्रवाद की बखिया उधेड़ता हुई उनकी कृति जनगणमन , ” मैं भी मरूंगा, और भारत के भाग्य विधाता भी मरेंगे , लेकिन मैं चाहता हूं
कि पहले जन-गण-मन अधिनायक मरें , फिर भारत भाग्य विधाता मरें , फिर साधू के काका मरें , यानी सारे बड़े-बड़े लोग पहले मर लें , फिर मैं मरूं- आराम से।